लक के सहारे पत्थर से पारस बनने की जुगत में लकी

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जौनपुर- यह ज़िला हमेशा से ही साक्षरता में अव्वल रहा है क्यूँकि यहाँ नामचीन स्कूल कालेजों के अलावा यहाँ की एक और ख़ासियत है की लगभग हर ब्लाक में आपको एक या दो महाविद्यालय देखने को मिल जायेगा हालाँकि ये विद्या के मंदिर समाज सुधार कम स्वयं के सुधार के ज़्यादा क़रीब होते हैं। ऐसे ज़िले में पढ़े लिखे लोग ज़्यादा हैं जो पढ़े लिखो की कद्र भी करते हैं।

अब आते हैं यहाँ की राजनीतिक समझ की तरफ़ जहाँ राजनीति के कॉलेज में पीएचडी से भी ऊपर की हैसियत रखने वाले पूर्व मंत्री,पूर्व सांसद, विधायक स्वर्गीय पारसनाथ यादव का नाम लिया जाता है और जौनपुर की राजनीति की चर्चा हो और इनका नाम न लिया जाए ऐसा नहीं हो सकता।एक जमाने में इन्हें मिनी मुख्यमंत्री का दर्जा प्राप्त था तो इसी से इनकी हैसियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

क्यूँकि सपा में इनको अश्वमेध का घोड़ा समझा जाता था लेकिन अश्वमेघ के घोड़े को सिर्फ़ एक व्यक्ति ही रोक पाया और वो हैं जौनपुर के क़द्दावर नेता पूर्व सांसद धनंजय सिंह। ये दोनो अपने चुनाव भले ही एक दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ते थे लेकिन कभी कोई निजी या सार्वजनिक मतभेद नहीं रहा। हाँ अलबत्ता राजनीतिक मतभेद ज़रूर रहे जो ये लोग अपने चुनावों तक ही सीमित रखते थे और एक दूसरे के निजी कार्यक्रमों में सहज आना जाना रखते थे और राजनीतिक सुचिता की मर्यादा का पालन करते हुए एक दूसरे को बहुत सम्मान भी देते।

स्वर्गीय पारसनाथ यादव की छवि एक कड़क नेता के तौर पर जानी जाती रही है जो उनके चुनावों में दिखती भी थी।

इनके पुत्र लकी यादव भी इन्ही की तरह कड़क हैं लेकिन इनका मैदान दूसरा रहा है क्यूँकि जब तक इनके पिता सांसद,मंत्री या विधायक रहे तो लकी किसी फ़िल्मी अवतार की तरह ही दिखते थे, जब किसी को मन किया पीट दिया या ज़मीन क़ब्ज़ा कर लिया जिनमें से एक ज़मीन का क़ब्ज़ा तो बहुत चर्चित भी हुआ था।समय के साथ इनका व्यवहार कितना परिवर्तित हुआ है ये तो वही जानें।लेकिन पहले तो यूँ समझिये की फ़िल्मों का गुलशन ग्रोवर पर्दे से बाहर आकर इनके अंदर घुस जाता था।

आज जब इनके पिता के स्वर्गवासी हो जाने के बाद मल्हनी सीट से समाजवादी पार्टी की तरफ़ से इनको ही उनका उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जा रहा है।लेकिन यक्ष प्रश्न ये है की सिर्फ़ जाती बिरादरी के नाम पर ये कहा तक लड़ पाएँगे इसको तो यही बता सकते हैं क्यूँकि एक तरफ़ ये सिर्फ़ अपने पिताजी का नाम लेकर और अपनी जाती बिरादरी जोड़कर घूम रहे हैं।और यहाँ ज़फ़राबाद के पूर्व विधायक सपा के ही स्वर्गीय शचीन्द्रनाथ त्रिपाठी का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है क्यूँकि ये ऐसे नेता थे की जिस गाँव में प्रचार करने जाते थे उसी गाँव में रुक जाते थे और ख़ासकर जो उनके विरोध में था उसी के घर ! उसके बाद तो न विरोध बचता था न विरोधी ख़ैर ! सबका अपना तरीक़ा है।

इधर पूर्व सांसद धनंजय सिंह जिनके लिए हर घर के दरवाज़े हमेशा खुले रहते रहे है और जब जहाँ मन किया घर में जाकर अपना घर समझ कर खाना लेकर खा लिया करते हैं।पूर्व सांसद धनंजय सिंह अपने द्वारा पूर्व में किये गये विकास के कार्यों के बलबूते मैदान में हैं और इनके साथ हर वर्ग के लोग जुड़े हुए हैं क्यूँकि इन्होंने कभी भी किसी का काम बिना जाट बिरादरी पूछे करने की चेष्टा की है।

पूर्व सांसद धनंजय सिंह द्वारा बीते रविवार से मल्हनी में धुँआदार क्षेत्र भ्रमण का आग़ाज़ देखकर और जनता के समर्थन को देखकर सभी विपक्षी दलो को सोचने पर मजबूर कर दिया है।क्षेत्र के लोगों का कहना है की धनंजय सिंह नेता नहीं बेटा हैं जिनसे जनता सीधे संवाद करती है और जो हमेशा उनके साथ उनके लिए खड़ा रहता है।

अब देखना ये है की अत्यंत ही पढ़े लिखे ज़िले में जनता लकी को राजनीति के विश्वविद्यालय में दाख़िला देती है या दाख़िला ही रद्द करेगी ये तो समय बताएगा।क्यूँकि इस बार के माहौल को देखते हुए लगता है की धनंजय सिंह हर बार की तरह जाँत पाँत से ऊपर उठकर जिस तरह से चुनाव लड़ रहे हैं वो आने वाले समय के लिये एक मिसाल होगा बाक़ी समय बड़ा बलवान।


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